तपिश में भी इक सुकून सा है,
ये कैसी उलझन बताओ तो सही।
अनुताप की आग जलती रहे,
कोई सावन बुलाओ तो सही।
उष्णता से तपे हैं दिलों के नगर,
फिर भी ठंडक की चाहत नहीं,
गरमाहट है रिश्तों में अब भी अगर,
कोई क़िस्सा सुनाओ तो सही।
गरमी में जलते हुए रास्ते,
थकान से भरी है ये सारी ज़मीं,
गर्माहट की कुछ बूँदें लिए,
कोई बादल बुलाओ तो सही।
गर्मी की तपन से झुलसते रहे,
प्यासे लबों की कहानी है ये,
तपन से भरा जो है हर एक घर,
कोई दरिया दिखाओ तो सही।
ताप सीने में पलता रहा उम्र भर,
और ताब भी अब बची है कहां,
कभी अहसासों की छाँव में आ,
कोई साया बिछाओ तो सही।

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