तपिश: अर्चना श्रीवास्तव ‘आहना’ द्वारा रचित कविता


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हर हाल में जीवन के कुछ रंग समेटने की घबराहट
वक्त की तपिश , कहीं पिघला ना दे अंतर की गर्माहट

मौसम की हलचलों से ,खलबली मचले,
ना-नुकूर करते रहें,कितने गुमान पिघले,
भीड़ को चुना,कभी तन्हाई के गिरफ्त में,
कहीं अंधेरे में गुम,कहीं उजालों के संभाले।

एहसासों के तार,अपनेपन की पहचान से निखरे,
शहर-दर-शहर घुमते रहे, हिले ठिकाने की बौखलाहट।

कभी बेखुदी के ढंग,कभी जख्मी हकीकत के जमाने,
कसक भरे भीड़ को चुना,कभी तन्हाई के खाली पैमाने,
तिसन्गी कैसी दाहक,हवाओं_सा फूंके रंगों की हसरत,
कभी गिले-शिकवे से गुजारे पल, उखड़ें भावों के किनारे!!!

बिना डरें,बिना फिसले अब जरा कदम संभाल के
ढूंढे़गे ऐ जिन्दगी, तेरे पहचान की अनदेखी आहट।

कहीं जरूरी, कुछ मजबुरी के तीक्ष्ण तीर चले,
पसंदगी के पुरजोर सवालों को , मौन ही कुचले,
अबतक ढूंढते रहें, फिजा के शोर में ,शोख स्वर को,
जीवन के रंग ,विलग तस्वीरों से झांक,तकते मिले।

हंसी के बहाने-सा बनता,रोने की सुरत बन निखरता ,
हर हाल में ,जीवन के कुछ रंग समेटने की घबराहट …


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