जीवन और संघर्ष: राधा शैलेन्द्र द्वारा रचित कविता


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जिंदगी की जंग कुछ इस तरह लड़ी है मैंने
हर मोड़ पे मिली है तकलीफे और मैंने उसे
हँसकर स्वीकारा है!
लक्ष्य तक पहुँचने की जिद में
हर मोड़ की अड़चनों को मील का पत्थर बना दिया!
कैसे निकलता है संघर्ष की आंच में तपकर सोना
मैंने अपनी जिंदगी का फलसफा ही इसे बना डाला!
मुश्किलों की तादात इतनी बढ़ गयी है आजकल
जीतने की जुनून ने योद्धा बना दिया!
कैसे बात करूं मैं उन अकस्मात हुए हादसों का
जिसने मुझे इंसान बना दिया!
पत्थरों से सीखा था जो हुनर
सख्त होने का उसे आजमा रही हूँ
लड़ती हूँ मैं हर दिन अपनी लड़ाई खुद से खुद के लिये
जीतने के हुनर ने मुझे क्या से क्या बना दिया!
फर्श से अर्श तक का सफर यूँ तय किया है
मैं चलती रही पर पावँ के छाले को न देखा
मंजिल तो बहुत दूर थी
पर कदमों को यूँ हीं बढ़ाती रहीं…. बस बढ़ाती रहीं


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