रात पेट को हथेली में लेकर सोया था,
संभवतः उसने अपने हिस्से का भोजन,
अपने भूखे बच्चे को खिलाया था,
दिन भर के परिश्रम से चरमराई उँगलियाँ,
थक कर चूर थीं, रोई नहीं,
पेट से लिपटकर सो गईं,
लकीरों से कहीं अधिक साफ दिखती,
उन मेहनती हाथों की दरारें,
उसके संघर्ष की मौन कहानी कह रहे थे,
रात ठिठुरन बहुत थी लेकिन,
सोते हुए उसकी निर्जीव मुस्कान ने कहा,
दीपक की लौ पर्याप्त है, अभी दीप्तिमान है,
भूमि से अर्जित, भूमि को समर्पित,
शरीर की समस्त कोशिकाएँ,
भूमि से आलिंगन कर झूम उठीं,
नींद ने अपने अंक में आज फ़िर सुला लिया है उसे,
आँसुओं और आशाओं से भरी आँखों से,
फ़िर एक नई भोर देखने की प्रतीक्षा में है,
एक मजदूर का जीवन ।
0 Comments