उड़ता गुलाल: गरिमा सूदन द्वारा रचित कविता


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चारों ओर दिखे उड़ता गुलाल,
नीला, पीला, हरा, गुलाबी और लाल।
गुलाल तूने मुझ पर ऐसे लगाया,
जैसे श्री कृष्ण ने राधा जी पर प्रेम दर्शाया!
ब्रज में फूलों की होली का मौसम आया,
पैर थिरके और दिल हर्षाया।
झूम-झूमकर सबने जोश से गाया,
‘होली आयी, होली आयी रे!’
चेहरों पर सबके मुस्कान लेकर आई।
रंगों का त्यौहार है यह,
खुशियों की बहार संग लायी।
पकवानों की जैसे बौछार है छाई,
पिचकारियों की भरमार है आई।
भरकर रंग वाली बाल्टी,नटखट टोली साथ लाई,
एक-दूजे पर डाले रंग
भीगे आँगन और तन-मन।
क्या सखियाँ और गोपाल-गोपियाँ,
सबके पीछे लेकर भागे लाठियाँ।
ब्रज की लट्ठमार होली का चलन,
मौज-मस्ती भरे पर्व में सब हुए मग्न।

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