इजाज़त माँगी थी बस थोड़ी सी,
तेरे ख्वाबों में जगह पाने की।
तेरे लफ़्ज़ों में खुद को ढूँढने की,
तेरे साथ कुछ पल खुलकर मुस्कुराने की।
पर हर बार तू चुप रहा,
जैसे मेरी बातों में वज़न ही न था।
तेरी नज़रों में जो सवाल थे,
उनमें मेरे हिस्से का जवाब ही न था।
इजाज़त — क्या बस एक शब्द था?
या मेरे होने का सबूत मांगता था?
क्या प्यार भी रज़ामंदी से बंधा होता है?
क्या दिल भी दस्तख़त मांगता है?
मैंने तो चाहा था बस साथ तेरा,
ना कोई कसम, ना कोई पहरा।
पर तूने मेरी हर ख्वाहिश को
“इजाज़त” की दीवार में कैद कर दिया।
अब मैं चली हूँ — बिना दरवाज़ा खटखटाए,
बिना किसी जवाब के, बिना कुछ बताए।
क्योंकि जो रिश्ता हर मोड़ पर
इजाज़त माँगता है — वो मोहब्बत नहीं रह जाता।

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