सुनो !
एक नन्हा सा ख्याल
आज़ उमड़ा है मेरे मन में
क्या मुझको इजाज़त है?
कि तुम्हारे दिल के
इक कोने में चुपचाप,
तुम्हारी हर धड़कन को
सुन सकूँ, समझ सकूँ!
जहाँ न कोई सवाल हो,
और न कोई जवाब
बस एक अहसास हो,
थोड़ा बेहिसाब!
तुम्हारे साँसों में बसकर
मैं जहाँ सुख-दुःख की ,
बेनाम साथी बन सकूँ
क्या इस पागलपन की मुझे
तुम्हारे दिल में इजाज़त है?

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