आकाशगंगा: शशि धर कुमार द्वारा रचित कविता


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अम्बर के आँचल में फैली ये चाँदनी,
सितारों की झिलमिल की अद्भुत कहानी।
अनंत के सागर में मोती सा चमके,
हर रात एक नई आध्यात्मिक कहानी।

असंख्य तारों के ये झुंडों की पंक्ति,
एक सेतु सा बने, आकाश की शक्ति।
जहाँ स्वप्नों का संसार है बसता,
धरा से दूर है, पर मन को उद्देलित करता।

अज्ञात रास्तों की ये अनजानी डगर है,
जन्म और मरण के रहस्य की खबर है।
रातों के संग गहराती ये लहर है,
आश्चर्य से भरी एक स्वर्णिम सहर है।

क्या छिपा है तेरे आंगन में गंगा,
क्या कभी रहस्य से पर्दा उठ पायेगा?
सदियों से चमकती, सबको है रिझाती,
पर अब तक अपने राज़ नहीं बताती।

आकाशगंगा, हो चमकते प्रेम का संगम,
ब्रह्माण्ड की दुनिया का गूढ़तम माध्यम।
हम निहारते रहते तुझमें है जो सपना छिपा,
हर रात आकर सबके सपनो को देते थपथपा।


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