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मज़दूर का जीवन : डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘ उदार’ द्वारा रचित कविता

सुबह सबेरे रात अंधेरे ,तक चलता जीवन
ये है मज़दूर का जीवन, हर इक मज़दूर का जीवन।।

नींद बिछौना धरती-पत्थर, और
ओढ़ना है आकाश
तकिया अपनी ही बाहों का, स्वप्न भरा जीवन ।।

छोटे से परिवार का मालिक, ना घर ना दरवाजा
बीबी -बच्चे ही सम्पत्ति, सड़कों पर जीवन।।

आतप-वर्षा,सर्दी -गर्मी, हर मौसम मेहनत के
स्वेद श्रमों के मोती जैसे, तन पे सजे जीवन।।

ईंट उठाए, तोड़े पत्थर, तन-मन बन जाते हैं बुन कर
भवन करे निर्माण ,सुखी हो औरों का जीवन ।।

राहगीर को राह दिखाए, कठिन
मार्ग पर सड़क बनाए
राह करे आसान, मिलाए मंज़िल से जीवन ।।

बस कर्त्तव्य नसीब में इसके, कोई भी अधिकार नहीं
धमकी-घुड़की मालिक की, खून के आँसू पीता जीवन।।

पेट पीठ से सटा हुआ,तन निर्बल मन सजग सबल है
धूप-ताप सब सहता, लौह बना रहता जीवन ।।

मिट्टी से सोना उपजाए, भोजन का रस थाल सजाए
सूखी रोटी पानी संग, ‘ उदार ‘
रहता किसान जीवन