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किसी तृष्णा का भंवर: डॉ. मीनल द्वारा रचित कविता

तृष्णा किसी के प्रेम को पाने की
किसी के प्रेम में दीवाना हो जाने की
किसी के प्रेम में पागल हो जाने की
मन में उठता
किसी तृष्णा का भंवर
स्थिर अवस्था में होता है या गतिशील
एक कंवल सी ही
इसकी एक-एक कली खिलती है या
प्रेयसी की अपनी बाहों में ही
अपने प्रेमी के तन की सुगंध कहीं छिपती है
एक गूढ़ विषय है यह भी प्रेम की ही तरह
कुआं है पास
जल से भरा
यह तन की प्यास है या
मन की या
सूखे अधरों की जो
कितना भी बुझा लो पर
लाख चाहने पर भी एक अग्नि सी
मन के अग्निकुंड में जलती है और
कभी न बुझती है।